लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मौत या हत्या ये सवाल आखिर क्यों उठते रहे हैं…

लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मौत या हत्या ये सवाल आखिर क्यों उठते रहे हैं.11 जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ था. हालांकि आज तक देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत किन परिस्थितियों में हुई ये आज भी रहस्य बना हुआ है. चलिए जानते हैं लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ी कुछ रोचक बातें.

जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ, तो उनके बाद आजाद भारत की सत्ता कौन  संभालेगा इस सवाल को देश के हर नागरिक ने महसूस किया होगा, लेकिन तकरीबन दो हफ्ते बाद ही भारत का अगला या फिर ये कहे कि दूसरा प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को बनाया गया था.

लाल बहादुर शास्त्री को उन दिनों लोग भारत के पूर्व गृह मंत्री के तौर पर जानते थे. उन्होंने देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा लिया था. आजाद भारत के सपने को पूरा करने के लिए पढ़ाई छोड़ स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते में चल पड़े.

2 अक्टूबर 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे शास्त्री महज़ डेढ़ साल के ही थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया जिसके बाद उन्हें चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया. वह पढ़ाई के लिए मीलों दूर चलकर जाया करते थे. लेकिन देश की आजादी के लिए लड़ने का फैसला लेने वाले शास्त्री ने 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी. 17 साल की उम्र में जेल भी गए लेकिन नाबालिग होने के कारण छोड़ दिए गए.

यह तो सब जानते हैं, कि लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे. लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर किन हालात में शास्त्री जी को पीएम बनाया गया था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद पीएम की रेस में दो लोगों का नाम सबसे आगे चल रहा था. एक थे मोरारजी देसाई और दूसरे थे लाल बहादुर शास्त्री.

यहां गौर करने वाली बात यह है, कि नेहरू अपने अंतिम दिनों में बहुत हद तक लाल बहादुर शास्त्री पर निर्भर थे और उनपर खुलकर भरोसा करते थे. वहीं दूसरी ओर मोरारजी देसाई पीएम की दौड़ में आगे तो थे, लेकिन ज्यादातर नेता सहमत नहीं थे. बातचीत के बाद नेताओं का मानना था कि मोरारजी देसाई एक विवादास्पद पसंद हो सकते हैं.

देसाई की आक्रामक छवि और मनमर्जी से फैसले लेने की आदत पर नेताओं को आपत्ति थी. जिसके बाद जिस नाम पर सबकी आम सहमति बनी वो थे लाल बहादुर शास्त्री. नेहरू के निधन के बाद इस पद पर बैठना शास्त्री के लिए आसान नहीं था. नेहरू का कद हर कोई मैच नहीं कर सकता था. लेकिन शास्त्री ने पीएम रहते हुए इस खालीपन को भरने में कोई कमी नहीं आने दी.

शास्त्री डेढ़ साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. साल 1966 में 11 जनवरी के दिन ताशकंद में उन्होंने अंतिम सांस ली थी. उन दिनों शास्त्री जी भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद के हालातों को लेकर समझौता करने के लिए ताशकंद में पाक राष्ट्रपति अयूब खान से मिलने गए थे. मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद अचानक उनकी मौत हो गई.

जबकि उनकी सेहत एकदम दुरुस्त थी. मौत की वजह हृदयाघात बताया गया. इतना ही नहीं, जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया तो प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, उनके शरीर पर घाव के निशान थे. लेकिन उनकी मौत की जांच के लिए बैठी राजनारायण जांच समिति ने कोई वैध नतीजे नहीं दिए. संसदीय लाइब्रेरी में भी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री की मौत की जांच रिपोर्ट का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

जिस व्यक्ति का राजनीतिक जीवन इतना साफ रहा हो, जिसका कोई पॉलिटिकल दुश्मन न रहा हो उसकी ताशकंद में अचानक हुई मौत अब भी सवाल है. 56 साल बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है. हालांकि इस छोटे से कार्यकाल में लाल बहादुर शास्त्री ने जो शोहरत और सम्मान हासिल किया वह अपने-आप में काबिले तारीफ था.

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