ध्वस्त हो जाएंगे चिराग पासवान, फिर कोई नहीं पूछेगा

परिवार में टूट हुई. पार्टी बिखर गई. एक छोटी सी पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. पार्टी का इकलौता विधायक जेडीयू में चला गया. इकलौती एमएलसी बीजेपी में चली गईं. चिराग पार्टी से भी गए, परिवार से भी गए.

जेडीयू और सीएम नीतीश कुमार की बत्ती गुल करने के फेर में चिराग ने अपना बंगला भी जला डाला. बीजेपी से बैर नहीं और नीतीश तेरी खैर नहीं के नारे के साथ विधानसभ चुनाव में उतरे चिराग पासवान का किसी ने साथ नहीं दिया. बर्बादी के बाद चिराग अकेले पड़ गए. चाचा पशुपति कुमार पारस और चचेरे भाई प्रिंस राज भी साथ छोड़ गए.

अपने जिस बहनोई अनिल कुमार साधु को चिराग पासवान देखना भी नहीं चाहते थें, सिर्फ एकमात्र व्यक्ति वह निकलें, जिन्होंने चिराग का साथ दिया. बाकी अनिल कुमार साधु आरजेडी के नेता हैं. उनकी भी एक सीमा रेखा और मर्यादा तय है. एक हद से बाहर जाकर वह भी चिराग का साथ नहीं दे सकतें.

जिस कुनबे को रामविलास पासवान ने बड़ी आरजू के साथ सजाया और संवारा था, आज उनके बेटे और भाई उसे मटियामेट कर चुके हैं. बात यहीं नहीं रुकती, अब दोनों एक दूसरे को तहस नहस करने के लिए म्यान से तलवार खींचे खड़े हैं. खुद को आबाद करने से ज्यादा एक दूसरे को बर्बाद करने का लक्ष्य लेकर मैदान में कूद पड़े हैं.

शायद ही रामविलास पासवान ने कभी सोचा होगा कि उनके अपने ही सगे भाई और बेटे एक दूसरे के साथ परिवार की जंग को सड़क पर लेकर आएंगे और परिवार की प्रतिष्ठा को तिनके की तरह बिखेर कर रख देंगे लेकिन अब तो परिवार और पार्टी दोनों टूट चुका है.

जिधर पशुपति कुमार पारस अपने स्वभाव के अनुसार सुविधावादी राजनीति के तहत जेडीयू और बीजेपी के खेमे के साथ आराम से जाकर कुर्सी कुर्सी का खेलने में मस्त हैं तो वहीं चिराग पासवान हैसियत बताने और अपने वजूद को स्थापित करने के उद्देश्य से दोनों ही सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.

लगभग समझौतावादी रवैया अपनाते हुए चुनाव आयोग ने चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के गुट को अलग अलग पार्टी की मान्यता प्रदान कर दी. चिराग को उड़ने के लिए हेलीकॉप्टर थमा दिया गया तो चाचा पशुपति कुमार पारस को चिथड़ सिलने के लिए सिलाई मशीन थमा दिया गया.

अब दो सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं. पासवान परिवार की राजनीति के लिहाज से ये दोनों सीटें काफी महत्वपूर्ण हैं. जहां एक ओर तारापुर विधानसभा सीट खुद चिराग पासवान के संसदीय क्षेत्र जमुई का हिस्सा है तो वहीं दूसरी कुशेश्वरस्थान सीट उनके चचेरे भाई प्रिंस राज के संसदीय क्षेत्र समस्तीपुर के तहत आता है.

जिधर पशुपति कुमार पारस अपने स्वभाव के अनुसार सुविधावादी राजनीति के तहत जेडीयू और बीजेपी के खेमे के साथ आराम से जाकर कुर्सी कुर्सी का खेलने में मस्त हैं तो वहीं चिराग पासवान हैसियत बताने और अपने वजूद को स्थापित करने के उद्देश्य से दोनों ही सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. प्रिंस पासवान अपने चाचा के साथ हैं और आराम से एनडीए का हिस्सा बने हुए हैं.

अपने ही संसदीय क्षेत्र में चिराग को उम्मीदवारों का अकाल पड़ गया. मजबूरी में उन्हें जमुई के रहने वाले चंदन सिंह को तारापुर लाकर चुनाव लड़ाना पड़ा है. कुशेश्वरस्थान से चिराग ने एक नई उम्मीदवार अंजू देवी को मैदान में उतारा है.

अब इन दोनों उम्मीदवारों को मिलने वाले वोट चिराग का भविष्य तय करेंगे. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि चिराग पासवान अपने वजूद की बेहद अहम लड़ाई लड़ रहे हैं वो भी अकेले अपने दम पर.

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