कांग्रेस हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव में बीजेपी को देगी कड़ी चुनौती…..

कांग्रेस हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव में बीजेपी को देगी कड़ी चुनौती. आपको बता दे हिमाचल प्रदेश और गुजरात में होने वाले चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां एक-दूसरे को कड़ी चुनौती देने में जुट चुकी है अब ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि क्या कांग्रेस पार्टी होने वाले चुनाव में अपने विपक्ष पार्टी यानी कि बीजेपी को टक्कर दे पाएगी…

क्योंकि खबरों के अनुसार यह बताया जा रहा है की विधानसभा और स्थानीय चुनावों में बीजेपी से मुकाबला करने का कांग्रेस ने कोई नया तरीका ढूंढ निकाला है. फिलहाल अब विपक्ष की ये रणनीति है कि चुनाव के केंद्र से नरेंद्र मोदी के नाम को दूर रखा जाए वहीं हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा में हो रहे चुनाव में भी विपक्ष की कोशिश है कि इसे स्थानीय मुद्दे और मुख्यमंत्री के कामकाज के आधार पर लड़ा जाए तथा राष्ट्रीय मुद्दों को इससे दूर रखा जाए…..

2014 से लगातार मात खाने के बाद कहीं न कहीं विपक्ष भी अच्छी तरह समझ चुका है कि भाजपा से वह भावनात्मक की सियासी लड़ाई में मुकाबला नहीं कर सकता और न ही वह क्षेत्रीय या स्थानीय चुनावों में नरेंद्र मोदी के नाम के सामने टिक सकता है. हालांकि , इस प्रकार के रणनीति का पहला प्रयोग 2015 में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में किया था…

तब केजरीवाल ने मोदी फैक्टर को काउंटर करने के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव को सिर्फ स्थानीय चुनाव बनाने की पूरी कोशिश की, इतना ही नहीं उस दौरान अपने प्रचार को भी बिजली-पानी तक ही सीमित रखा. आपको बता दे आखिरी तक केजरीवाल इसी रणनीति पर टिके रहे और बड़ी जीत हासिल की…

दरअसल, वही 2014 के बाद से हुए चुनावों को देखें तो जब भी विपक्ष ने नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला कर उन्हें चुनाव के केंद्र में लाने और बीजेपी के राष्ट्रवाद और हिंदुत्ववाद से मुकाबला करने की कोशिश की तो हर बार दांव उल्टा पड़ा. जिससे ये जाहिर है, स्थानीय और राज्य सरकार से जुड़े मुद्दों पर टिके रहना इन विपक्षी दलों के लिए विकल्प नहीं बल्कि एक तरह से मजबूरी बन चुका है…..

अब तक़रीबन सभी दल आम सहमति से बीजेपी की सबसे मजबूत पिच से खुद को अलग करने की कोशिश में लगे हुए है. बता दे दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में तेजस्वी यादव हों या फिर हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रचार हो, सभी केवल स्थानीय मुद्दों पर ही बात करने लगे हैं…..

वहीं 2014 के बाद से अब तक 50 विधानसभा चुनाव हुए हैं. इसमें 24 चुनाव बीजेपी और उनके सहयोगी दलों ने जीते हैं. इनमें से कांग्रेस ने 7 और क्षेत्रीय दलों ने 19 चुनाव जीते हैं. जहां बीजेपी की सरकार थी, वहां 11 जीते और 7 हारे. जहां-जहां बीजेपी हारी है, वहां क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दे अहम कारण बने हैं….

ऐसे में आंकड़े भी यही साबित करते हैं कि विपक्ष की इस सोच के पीछे एक मजबूत तर्क है. 2020 विधानसभा चुनाव में बिहार में तेजस्वी यादव ने पूरे चुनाव प्रचार में ही नरेंद्र मोदी का नाम लिया. अभी कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में पूरा फोकस हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर और गुजरात में भूपेंद्र पटेल के कामकाज के आस पास ही रखा है. भले इस बार भी विपक्ष अपनी जो भी रणनीति बनाए, हालांकि भाजपा गुजरात और हिमाचल प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नाम को सामने लाकर ही चुनाव लड़ने की मंशा दिखा रही है और पार्टी को उम्मीद है कि इसमें वह सफल भी होगी…..

वहीं दूसरी ओर इसी साल के शुरू में उत्तराखंड में जब स्थानीय स्तर पर बीजेपी कमजोर दिख रही थी, तो नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने लाकर न सिर्फ सत्ता बचाई, बल्कि बड़ी जीत भी हासिल की, लेकिन बीजेपी को पता है कि यह एक ऐसी कमजोरी है, जो अब सामने आ चुकी है और इसका काउंटर तलाशना होगा…

वह राज्यों पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहेगी. इसके लिए बीजेपी को भी अब स्थानीय नेतृत्व पर फोकस करने की रणनीति पर काम करना पड़ सकता है. उधर, विपक्ष को भी पता है कि नरेंद्र मोदी या राष्ट्रीय मुद्दों को अलग कर चुनाव लड़ने की रणनीति स्थायी नहीं हो सकती. 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे, जहां उसे इन्हीं दो चीजों का सामना करना पड़ेगा…..

 

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