लालू की गाली ने कांग्रेसियों की मरे हुए जमीर को जिंदा कर दिया…

राजनीति में दो दलों के बीच का गठबंधन टूटना न तो कोई पहली घटना है और न ही इसमें कुछ खास बात होती है. दल और दिलों का गठबंधन टूटने के लिए ही बनता है. ऐसा कोई गठबंधन नहीं जो कभी टूटा न हो… हम बात भारत के राजनीतिक दलों की कर रहे हैं.
लंबे समय से आरजेडी की बैसाखी पर अपनी वैतरणी पार करने वाली बिहार कांग्रेस पहली बार इन दिनों लड़ती हुई नजर आ रही है. इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में आरजेडी का बड़ा जनाधार है और कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं लेकिन जनाधार तो बनाने से बनता है. एसी कमरो में सुस्ताने से नहीं. कुछ यही हाल कांग्रेस का भी हो गया था.

आरजेडी ने झटका दिया तो कांग्रेस ने भी स्वाभिमान का परिचय देते हुए तारापुर और कुशेश्वरस्थान विधानसभा क्षेत्र में अपने प्रत्याशी उतार दिए. चुनाव का नतीजा कुछ भी हो लेकिन कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता इस दौरान अपना पसीना बहाते नजर आए.

पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार से लेकर पूर्व गवर्नर निखिल कुमार, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ अखिलेश प्रसाद सिंह, सभी विधायक, पूर्व विधायक, पूर्व सांसद, एमएलसी, पूर्व एमएलसी और पार्टी संगठन से जुड़े नेताओं ने गली गली, गांव गांव, खेत खलिहानों में घूम घूमकर मेहनत किया और वोट मांगा. ये नजारा कांग्रेस में पहले कभी नजर नहीं आया.

कई दशकों के बाद यह मौका आया जब बिहार में कांग्रेस चर्चा कें केंद्र में है. वोट कितना आया और इसका नतीजा क्या होगा, ये तो रिजल्ट बताएगा लेकिन कांग्रेस लड़ती हुई नजर आ रही है. हर जगह लोग कांग्रेस की चर्चा कर रहे हैं. गलत तरीके से करें या सही तरीके से करें, बात तो कांग्रेस की होने लगी है.

ब्राह्मणों, राजपूतों, भूमिहारों में नीतीश कुमार की वजह से बीजेपी से भी नाराजगी होती जा रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में भी नारा गूंज रहा था, बीजेपी से बैर नहीं और नीतीश तेरी खैर नहीं लेकिन सवर्ण जातियों के बीच कोई विकल्प नहीं था. सवर्ण राजद को वोट दे नहीं सकते थें तो मजबूरी में एक बार फिर से एनडीए को ही वोट देना पड़ गया था लेकिन सवर्णों के पास अब कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभर गई है. यह बिहार में नीतीश और भाजपा दोनों के लिए खतरा है.

वहीं आरजेडी की मुसीबत मुस्लिम वोटों को लेकर है. पढ़ा लिखा मुस्लिम नौजवान आरजेडी की जगह कांग्र्रेस को पसंद करने लगा है. तारापुर में जहां 25 प्रतिशत मुस्लिम वोट कांग्रेस के साथ जाता हुआ नजर आ रहा है तो वहीं कुशेश्वरस्थान में 90 प्रतिशत मुस्लिम वोट कांग्रेस के साथ है.

कांग्रेस का अकेले लड़ना एनडीए और आरजेडी दोनों के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है. बिहार की जनता तीसरे विकल्प की तलाश कर भी रही थी, अगर कांग्रेस संघर्ष के रास्ते पर चलती रही तो जनता उसे तीसरे विकल्प के तौर पर स्वीकार भी कर सकती है. रास्ता मुश्किल और लंबा जरुर है लेकिन कांग्रेस चाहे तो बिहार उसके लिए मील का पत्थर साबित होने जा रहा है.

पहले तो कांग्रेस के पास कोई भीड़ बंटोरने वाला नेता भी नहीं था. अब तो कन्हैया कुमार है. कन्हैया कुमार से तो आरजेडी इतनी डरी हुई है कि तेजस्वी से लेकर तेजप्रताप और रोहिणी आचार्या तक हमला कर रही हैं. कन्हैया की सभाओं में भीड़ जुटने लगी है. इसी बीच अगर पप्पू यादव अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर देते हैं तो आसानी से सभी जिलों में कांग्रेस का मजबूत संगठन तैयार हो सकता है. इसके बाद कांग्रेस को भी वोटों के गुणा गणित और समीकरण को तैयार करना रहेगा.

कांग्रेस को धन्यवाद देना चाहिए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को. उन्होंने जाने अनजाने में ही सही प्रदेश कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास जैसे दलित नेता को गाली देकर बिहार में कांग्रेसियों के मरे हुए जमीर को जिंदा कर दिया.. यही वजह है कि बिहार में मर चुकी कांग्रेस में अब सांस आती हुई दिखाई दे रही है.

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