वीपी सिंह… जिसने भारतीय राजनीति में झूठे आरोपें और चरित्र हनन की राजनीति की शुरुआत की

विश्वनाथ प्रताप सिंह… भारत का एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने भारत की तस्वीर और तकदीर बदल कर रख दी. वैसे तो विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म एक राजघराने में हुआ था… और जाति से राजपूत लेकिन वंचितों की हिस्सेदारी के उनके फैसले ने भारत में एक नया अध्याय लिख दिया था. देश भर में नारा गूंजने लगा था, राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह भारतीय गणराज्य के आठवें प्रधानमंत्री और देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के सीएम के तौर पर जनता की सेवा की. केंद्र में राजीव गांधी की सरकार का पतन हुआ और एक अजीबोगरीब घटनाक्रम में विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. विश्वनाथ प्रताप सिंह भारतीय जनमानस में वीपी सिंह के नाम से लोकप्रिय हुए.

जब विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बनें तो क्षत्रिय समाज में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. भारत से लेकर नेपाल तक में राजपूत समाज ने खुशियों के दीप जलाएं. जश्न भी क्यों न मनाया जाए आखिर आजादी के बाद पहली बार कोई राजपूत भारत का प्रधानमंत्री बना जाए लेकिन सामाजिक न्याय की राह पर चलने की ठान चुके वीपी सिंह के एक फैसले ने उन्हें राजपूत बिरादरी की नजर में एक विभाजनकारी व्यक्तित्व बना दिया.

राजपूत परिवार में जन्म लेने के बावजूद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देश भर में मंडल कमीशन लागू करने जैसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला लिया जिसकी वजह से देश भर के सवर्ण समुदाय में उनकी छवि खलनायक की बन गई और वह ओबीसी समाज के लिए जननायक बन गए. जो समाज उन्हें अपना नायक मान बैठा था, एकाएक वह उनकी नजर में खलनायक मान बैठा.

बोफोर्स तोप में कमीशनखोरी और दलाली का मुद्दा उठाकर कांग्रेस को लात मारकर बाहर आए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जैसे ही मंडल कमीशन को देश भर में लागू करने का फैसला लिया, देश भर में सवर्ण समुदाय ने उनके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. नारा गूंजने लगा राजा नहीं है रंक है, देश भर का कलंक है. वीपी सिंह ने इन बातों की परवाह नहीं की और पिछड़ी जातियों को हिस्सेदारी के अपने फैसले पर कायम रहें.

वीपी सिंह अक्सर कहा करते थें कि सामाजिक परिवर्तन की जो मशाल उन्होंने जलाई है, उसके उजाले में जो आंधी उठी है, उसका तार्किक परिणति तक पहुंचना अभी शेष है. अभी तो सेमीफाइनल भर ही हुआ है, संभव है कि इसका फाइनल मेरे बाद ही हो लेकिन मेरे मंडल कमीशन को लागू करने के बाद जो रास्ता बना है, अब कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं पाएगी.

जाहिर तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन के जरिए देश भर के तमाम पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण देकर एक नया कीर्तिमान बना दिया था लेकिन आलोचकों की नजर में विश्वनाथ प्रताप सिंह वो पहले शख्स थें जिन्होंने राजनीति में झूठ का पहला प्रयोग किया था.

जिस वक्त राजीव गांधी की सरकार के पतन के बाद लोकसभा के चुनाव हो रहे थें, उस दौरान अपनी चुनावी सभाओं में विश्वनाथ प्रताप सिंह एक पर्ची लेकर चलते थें और बताते थें कि बोफोर्स तोप की दलाली खाने वालों के नाम इस पर्ची में हैं. जैसे ही मेरी सरकार बनेगी और मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूंगा, मैं बोफोर्स के दलालों को जेल भेजने का काम करुंगा.

वीपी सिंह की सरकार भी बन गई लेकिन बोफोर्स दलाली में कोई जेल नहीं गया. वीपी सिंह की वो पर्ची उनकी जेब में ही कही गुम हो गई. राजीव गांधी की हत्या भी हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स दलाली की बात को सिरे से खारिज कर दिया.

सवाल उठने लगे थें कि अगर राजीव गांधी ने बोफोर्स तोप की खरीद में दलाली खाई थी तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ! वीपी सिंह ने उनपर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया !

वीपी सिंह ने मंडल कमीशन लागू कर निस्संदेह बड़ा काम किया था लेकिन चरित्र हनन की जिस राजनीति की जो शुरुआत उन्होंने की, आज वह भारतीय राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुका है.

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