क्यों मनाते हैं, नरक चतुर्दशी।

जैसा कि हम जानते हैं नरक शब्द का उल्लेख करते ही सर्वप्रथम हमारे दिमाग में एक ही देवता का ख्याल आता है,जिन्हें हम मृत्यु के देवता यमराज कहते हैं। और इनसे हम और आप काफी भयभीत रहते हैं। यही वजह है कि हम कभी इन्हें याद नहीं करते।

हालांकि और देवी-देवताओं की तरह साल में 1 दिन ऐसा होता है जिस दिन हम यमराज का पूजा करते हैं और उस दिन को हम नरक चतुर्दशी के नाम से जानते हैं। जो कि कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार यह कहा जाता है कि दिवाली से ठीक एक दिन पहले वाले दिन को हम नरक चतुर्दशी के रुप में मनाते हैं। तथा मृत्यु के देवता यमराज का पूजा विधि-विधान के साथ करते हैं,तथा उनसे अकाल मृत्यु से मुक्ति हेतु तथा सदा स्वस्थ रहने के लिए प्रार्थना भी करते है।

नरक चतुर्दशी के दिन चिड़चिड़ी के पत्ते का भी काफी महत्व होता है। इस दिन प्रातः सूर्योदय से पहले स्नान आदि करके चिड़चिड़ी के पत्ते को सिर के ऊपर फेरना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने से मन में सता रही मृत्यु की भय से मुक्ति मिलती है। नरक चतुर्दशी के दिन रात्रि में दीप-दान अवश्य करना चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं,तो मृत्यु से जुड़ी आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाएगी। इसलिए हर वर्ष याद से नरक चतुर्दशी के दिन दीप-दान करें।

नरक चतुर्दशी के दिन इस तरह करें दीपदान:-

घर के बच्चों को सुला दे। उसके पश्चात घर के कोई भी एक व्यक्ति दिए को जला ले। याद रहे नरक चतुर्दशी के दिन रुई की बत्ती का इस्तेमाल ना करें। कपड़े से बनी बत्ती का ही केवल इस्तेमाल करें तथा दीये में घी की जगह सरसों तेल का उपयोग करें। रात्रि में घर के अन्य सदस्यों को भोजन करके सोने के बाद दीप प्रज्वलित कर ले तथा घर के सारे कोने में अच्छे से दिखा दे। इसके बाद घर से बाहर निकलकर दक्षिण दिशा की ओर दीप को रख दें और वापस मुड़कर ना देखें और सीधे घर के अंदर आ जाएं। और मन में मृत्यु के देवता यमराज से प्रार्थना करें कि वह आपको अकाल मृत्यु से मुक्त करें।

ध्यान रहे कि दीये में तेल की मात्रा ज्यादा ना हो, क्योंकि यदि दिया सुबह तक जलता है तो इसे काफी अशुभ माना जाता है।

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