एक सफल इंसान अपने दिमाग का कितना प्रतिशत इस्तेमाल करता है ?

आप अपने दिमाग की क्षमता का कितना प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं ?

भगवान ने हर इंसान को दिमाग दिया है. इसी दिमाग की वजह से कोई कोई आइंस्टाइन जैसा बु़द्धमान वैज्ञानिक बन जाता है और कुछ लोग इसी दिमाग की वजह से समाज में मूर्ख घोषित हो जाते हैं. दिमाग तो सबके पास बराबर होता है लेकिन फर्क इसके पूरे इस्तेमाल से पड़ता है. जिसने ज्यादा इस्तेमाल किया, वो आदमी बन जाता है और जो इस्तेमाल नहीं कर पाता उसे लोग मूर्ख की उपाधि दे देते हैं.

वर्ष 2014 में हॉलीवुड की एक फिल्म आई थी लूसी. इस फिल्म में यह दिखाया गया कि कैसे कोई इंसान अपने दिमाग का 100 प्रतिशत इस्तेमाल कर कौन कौन सा करिश्मा कर सकता है. हम चाहें तो अपने दिमाग का 100 प्रतिशत इस्तेमाल कर अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों के शरीर और दिमाग पर कब्जा कर सकते हैं.

एक नेता क्या करता है… अपने दिमाग से लाखों करोड़ों लोगों पर अपना जादू चला देता है. किसी ने भगवान को नहीं देखा लेकिन अपने दिमाग के दम पर ये नेता करोड़ों लोगों के दिल और दिमाग को अपने काबू में रख लेते हैं और ये लोग उन्हें भगवान मानना शुरु कर देते हैं.

फिल्म लूसी में दिखाया गया है कि कुछ वजहों से एक्ट्रेस के पेट में एक नीले रंग का खास केमिकल चला जाता है. उस केमिकल की वजह से लूसी की दिमागी ताकत बढ़ जाती है. लूसी समय के किसी हिस्से में जा पाने में सक्षम हो जाती है. अपनी खास दिमागी ताकत की वजह से वह कभी डायनासोर के बीच पहुंच जाती है तो कभी धरती के पहले इंसान से मिल लेती है. फिल्म के अंत में एक्ट्रेस कचरे के एक चमकदार ढेर में बदल जाती है.

खैर, ये तो रही फिल्म की बात लेकिन यह सोचने और रिसर्च करने का विषय है कि क्या कोई भी इंसान अपने दिमाग का 100 प्रतिशत इस्तेमाल करने के बाद लूसी की तरह चमकदार कचरे के ढेर में तब्दील हो सकता है ?

आपने कई बार लोगों से बातचीत के दौरान यह सुना होगा कि हम अपने दिमाग की ताकत का पूरा इस्तेमाल नहीं करते. हम अपने दिमाग की क्षमता का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल करते हैं. क्या यह बात सही है ? इसमें कितनी सच्चाई है ? कई ज्यादा विद्वान महापुरुष तो यहां तक कह देते हैं कि इंसान अपनी बुद्धि का महज 1 प्रतिशत ही इस्तेमाल करते हैं.

सबसे पहले तो यह बात अपने दिमाग में बैठा लिजिए कि ये सभी बातें पूरी तरह से बकवास है. इंसान अपने दिमाग का 01 प्रतिशत या 10 प्रतिशत नहीं बल्कि 100 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल में लाता है.

आपको पता होगा कि दिमागी चोटें कितनी खतरनाक न्यूरो साइंटिस्ट बैरी जोर्डन कहते हैं कि अगर हम इंसान अपने दिमाग का सिर्फ कुछ ही प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल में लाते तो हमारे दिमाग में लगने वाली चोटें बिल्कुल ही खतरनाक नहीं होती क्योंकि दिमाग का ज्यादातर हिस्से का तो आप इस्तेमाल करते ही नहीं. वह हिस्सा तो आपके लिए बेकार साबित हुआ, फिर वहां चोट लगने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए था.

ये दिमागी चोट ही होता है, जिसकी वजह से कई बार इंसान कोमा में चला जाता है. इंसान सिर्फ 01 या 10 प्रतिशत ही अपने दिमाग का ठीक ठाक इस्तेमाल करता है, लोगों के मन में यह बात बैठी कैसे, इसे इस तरह से मिसाल के साथ समझा जा सकता है.

उदाहरण के तौर पर अगर आपको किसी परीक्षा में उम्मीद से कम मार्क्स मिलें तो आपको लगेगा कि आपने अपने तैयारी ठीक तरह से नहीं की या कम की तो इस वजह से आपके मार्क्स कम हो गए…अब अगली बार आप ज्यादा मेहनत यानी ज्यादा तैयारी करते हैं तो उसमें आपको ज्यादा मार्क्स मिलेंगे. यहीं से यह धारणा आपके मन में बैठ जाती है कि पहले आपने अपने दिमाग का कम इस्तेमाल किया तो मार्क्स कम आए और दूसरी बार आपने अपने दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा किया तो रिजल्ट बेहतर आ गए.

वर्ष 1936 में लॉयल थॉमस नामक एक लेखक ने लिखा कि हम इंसान अपने दिमाग की क्षमता का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल करते हैं. उन दिनों लोगों ने इस किताब को खूब पसंद किया और यह किताब भी एक वजह रही कि सभी के दिमाग में ऐसी धारणा बन गई कि इंसान सचमुच अपने दिमाग का केवल 10 प्रतिशत क्षमता का ही उपयोग करता है, पर ये सच नहीं है.

दिमाग की एमआरआई स्कैन पर रिसर्च करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि इंसान का दिमाग मुख्य रुप से तीन हिस्सों में बंटा हुआ है. सबसे आगे वाले भाग को सेरिबर्म कहा जाता है… यह हिस्सा हमारे बोलने, देखने और याद रखने जैसे गुणों को नियंत्रित रखता है. सर के पीछे वाले हिस्से सेरिबेल्म कहा जाता है. हम अपना हाथ पैर की गतिविधियां इसी हिस्से की मदद से करते हैं.

दिमाग के बीच के मध्य हिस्सा ब्रेन स्अेम कहा जाता है. ब्रेन स्टेम की मदद से ही हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करना है. हमारे सोने जागने की गतिविधियों और पाचन तंत्र पर नियंत्रण रखता है.

इससे यह सिद्ध होता है कि हमारी हर गतिविधियों के बीचे दिमाग का ही हाथ होता है. हम चाहे भोजन करते हो, चलते फिरते हो, कुछ न कुछ सोचते रहते हैं या फिर एकदम खाली बैठे रहते है…. हर स्थिति में हम अपने दिमाग का 100 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं.

अब आपके दिमाग में एक सवाल बार बार आ रहा होगा कि अगर हम सभी अपने दिमाग का 100 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल करते हैं तो कोई व्यक्ति एकदम से बेवकूफ या कोई व्यक्ति एकदम से बुद्धिमान कैसे हो जाता है ! वास्तव में एक साधारण से इंसान के दिमाग में उतने ही न्यूरॉन्स हैं जितना आइंसटाइन या फिर किसी दूसरे वैज्ञानिक के दिमाग में थें, तो फिर हर किसी को वैज्ञानिक या बुद्धिमान क्यों नहीं बन जाता ?

इसका जवाब भी हम आपको एक आसान से उदाहरण के साथ समझा देते हैं. ओलंपिक गेम्स में आपने एक वेट लिफ्टर को अपने हाथ से 200 किलो तक का वजन उठा लेते हैं. हम जैसा साधारण इंसान लाख कोशिश कर ले लेकिन 50 से 60 किलो तक का वजन से ज्यादा उठा नहीं पाएगा.. इसका मतलब ये कतई नहीं हुआ कि हम अपने हाथों की ताकत का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. हम अपने हाथों की पूरा ताकत का पूरा इस्तेमाल करते हैं लेकिन हमने उतनी मेहनत नहीं की जितनी उस ओलंपिक खिलाड़ी ने की है. मेहनत और प्रयास ये यहां सबसे बड़ी वजह है दोनों के वजन उठाने की क्षमता के बीच की फर्क का…

उस खिलाड़ी ने कड़ी मेहनत और प्रयासों की वजह से 200 किलो का वजन उठाने की अपनी ताकत को विकसित कर लिया और हम ऐसा नहीं कर पाते हैं. ठीक ऐसे ही हमारा दिमाग भी एक तरह की मांसपेशी ही है. हम जितना ज्यादा परिश्रम करेंगे, दिमाग पर जोर डालेंगे, चिंतन मनन करेंगे, स्टडी करेंगे… उनती ज्यादा हमारे दिमाग की कसरत होगी और हमारे दिमाग की क्षमता बढ़ जाएगी.

हमारे दिमागमें तकरीबन 1 खरब न्यूरॉन्स होते हैं. सभी न्यूरॉन्स एक दूसरे से जुड़े होते हैं और एक दूसरे को संकेत देते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार हमारे न्यूरॉन्स जितने एक्टिव होकर एक दूसरे को संकेत भेजते हैं, हम उतने ही होशियार और बुद्धिमान होंगे. संकेंत भेजने की इस प्रक्रिया की वजह से ही हम एक साथ कई काम कर पाते हैं. यहां पर यह बात याद रहे कि न्यूरॉन्स के तेजी से संकेत भेजने की गति को सिर्फ प्रैक्टिस यानी कि मेहनत करके ही बढ़ाई जा सकती है.

कई जगहों पर बाजार में ऐसी दवाएं उपलब्ध होने का दावा किया जाता है जो दिमाग को ज्यादा होशियार बनाती हैं लेकिन यकिन मानिए ऐसी कोई दवाई नहीं है या फिर लूसी फिल्म की तरह कोई ऐसा केमिकल नहीं है तो आपके न्यूरॉन्स को ज्यादा एक्टिव कर सके. इसकी सिर्फ एक ही दवाई है. आप खूब प्रयास करें. दिमाग पर जोर डालें. सीखने समझने की कोशिशों में तेजी लाएं. ऐसा करने से आपके दिमाग के न्यूरॉन्स ज्यादा एक्टिव होंगे और आप ज्यादा बुद्धिमान बनेंगे.

आइंस्टाइन हो या फिर कोई अन्य वैज्ञानिक उन्होंने प्रयासों की बदौलत ही अपने दिमाग को ज्यादा बुद्धिमान बनाया है. आप एक और उदाहरण को समझें कि कैसे एक एथलीट यानी धावक अपने पैरों को मजबूत करने के लिए खूब दौड़ता है, मेहनत करता है.. उसी तरह से एक वैज्ञानिक भी अपने दिमाग के घोड़े को खूब दौड़ाता है, तब वह कोई खोज कर पाता है और वैज्ञानिक कहलाता है.

सच्चाई तो यह है कि जो लोग परीक्षा में पास नहीं हो पाते, कम मार्क्स लाते हैं या फिर फेल हो जाते हैं… तो ऐसा नहीं है कि ये लोग अपने दिमाग का कम इस्तेमाल करते हैं या सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल करते हैं. ये वहम अपने दिमाग से निकाल दिजिए… दरअसल ये लोग मेहनत ही नहीं करतें, प्रयास ही कम करते हैं जिसकी वजह से इन्हें मनमाफिक सफलता नहीं मिल पाती. ऐसे लोग प्रयास ही 10 प्रतिशत करते हैं. वहीं आइंसटाइन और दूसरे वैज्ञानिकों ने प्रयास 100 प्रतिशत किया और रिजल्ट भी उन्हें 100 प्रतिशत ही मिला.

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